चीन की गिरती साख: क्या भारत भर पाएगा निवेश का खाली स्थान?

चीन की गिरती साख: क्या भारत भर पाएगा निवेश का खाली स्थान?

भारत के लिए चीन की गिरती स्थिति का अवसर

इन दिनों दुनिया की नज़रें तेजी से बदलते व्यापार और निवेश परिदृश्य पर हैं। एक समय था जब चीन विदेशी निवेशकों के लिए शीर्ष स्थान था, लेकिन आज हालात कुछ अलग हैं। 'चीन प्लस वन' रणनीति में भारत को कहीं न कहीं सीमित सफलता मिल रही है, जबकि वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देश इस अवसर को पूरी तरह भुना रहे हैं। ये देश कम लागत वाले श्रम, सहज टैक्स नियमों और मुक्त व्यापार समझौतों के सहारे निवेशकों का ध्यान खींचने में सफल हो रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की मानें तो चीन में विदेशी निवेश की कमी ने भारत को एक वैकल्पिक गंतव्य के रूप में देखा जाने लगा है। विश्लेषकों का मानना है कि 2024 में भारत की आर्थिक वृद्धि 6.9% तक हो सकती है। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध ने भारत की संभावनाओं को और भी मज़बूत बना दिया है। भारतीय कपास उद्योग को अमेरिका द्वारा चीन पर लगाए गए अतिरिक्त शुल्कों से नया बाजार मिल सकता है, हालांकि भारतीय किसानों को अतिरिक्त अमेरिकी कृषि उत्पादों के आगमन से कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

चीन की रणनीतियाँ और साइबर सुरक्षा खतरे

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लेकिन कहानी का एक और पहलू भी है। चीन ने अब अमेरिकी खुफिया बुनियादों पर हमला करने का ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया है। वे फर्जी नौकरियों और कंसल्टिंग फर्मों के नाम पर पूर्व अमेरिकी कर्मचारियों से गोपनीय जानकारी चोरी करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी हरकतें साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा मानी जा रही हैं।

इन सभी घटनाओं के बीच, अगर भारत को निवेशकों को आकर्षित और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में खुद की जगह बनानी है, तो उसे कुछ खास नीतिगत सुधार करने होंगे। इसके लिए श्रम कानूनों में बदलाव, बुनियादी ढांचे को सुधारना और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट में अन्य देशों से मुकाबला करना शामिल है। एक ऐसा कदम भारत के लिए सही दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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